अपने सियासी जीवन के दौरान लाल कृष्ण आडवाणी को एक विवाद ने काफी नुकसान पहुंचाया। क्या था वो विवाद ?

    भारतीय जनता पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक , जिन्होने महज 14 वर्ष की आयु में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS से जुड़कर अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। जी हां, हम बात कर रहे है लाल कृष्ण आडवाणी की। वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी का आज जन्मदिन है. वे आज 95 साल के हो गए हैं और इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई बड़े नेता उन्हे बधाई देने उनके आवास पर पहुंचे । इसी के साथ आज हम आपको लाल कृष्ण आडवाणी की ज़िंदगी से जुड़े कुछ ऐसे रोचक और अनकहे किस्से बताएंगे, जो आपने भी नही सुना होगा।


    क्या आप जानते है देश में भारतीय जनता पार्टी को मजबूत बनाने में लालकृष्ण आडवाणी की बड़ी भूमिका मानी जाती है ?
    दरअसल, आडवाणी का जन्म आज ही के दिन 1927 में कराची के एक सिंधी परिवार में हुआ था। 14 साल की उम्र में वे 1941 में RSS के स्वयंसेवक बन गए थे।इसके बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन संघ और पार्टी को मजबूत बनाने में लगा दिया। तो वही भाजपा की स्थापना के बाद उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ मिलकर पार्टी को बुलंदी पर पहुंचाने के लिए काफी संघर्ष किया। यही कारण है कि भाजपा की सियासी मजबूती में उनका बड़ा योगदान माना जाता है।


    साथ ही, आपको ये भी बता दे आडवाणी को राम जन्मभूमि अभियान का शिल्पकार भी माना जाता रहा है। अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए उन्होंने 1990 में सोमनाथ से रथयात्रा निकाली थी। इस रथयात्रा के बाद राम मंदिर आंदोलन को काफी ताकत मिली थी।इस रथयात्रा के बाद वे देश के सियासी परिदृश्य पर एक महत्वपूर्ण नेता के रूप में उभरे थे।
    अगर इनके निजी जीवन की बात करे तो पाकिस्तान के कराची में पैदा होने वाले लालकृष्ण आडवाणी के पिता किशन चंद आडवाणी व्यापार किया करते थे। आडवाणी की शुरुआती पढ़ाई भी कराची में ही हुई। भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के समय उनका परिवार पाकिस्तान छोड़कर भारत आकर बस गया था।भारत आने के बाद उन्होंने हैदराबाद के के डी जी कॉलेज से अपनी आगे की पढ़ाई पूरी की।


    बाद में उन्होंने बॉम्बे यूनिवर्सिटी के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज से कानून की भी पढ़ाई की। 1965 में उनका विवाह कमला आडवाणी के साथ हुआ था। उनका एक बेटा जयंत और एक बेटी प्रतिभा है।
    14 साल की उम्र में 1941 में वे संघ के स्वयंसेवक बने थे इसके बाद उन्होंने कराची में कई शाखाएं विकसित कीं। बाद में भारत आने के बाद वे भारतीय जनसंघ के सदस्य बने। emergency के बाद जनसंघ समेत कई दलों का जनता पार्टी में विलय हो गया था। देश में जनता पार्टी की सरकार बनी थी। हालांकि वैचारिक मतभेदों के कारण यह सरकार लंबे समय तक नहीं चल सकी , तो इसके बाद उन्होने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ मिलकर भारतीय जनता पार्टी का गठन किया।
    आडवाणी ने देश में हिंदुत्व की विचारधारा को एकजुट करने और भाजपा की लोकप्रियता बढ़ाने में अपनी पूरी ताकत लगा दी। भाजपा के शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में देश में एनडीए की सरकार बनने पर लालकृष्ण आडवाणी को गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

    लेकिन आपको शायद ही पता होगा कि अपने सियासी जीवन के दौरान आडवाणी को एक विवाद ने काफी नुकसान भी पहुंचाया। उनके सियासी जीवन का ढलान उसी वक्त शुरू हो गया था जब 2005 में उन्होंने पाकिस्तान जाकर जिन्ना को सेकुलर बताया था।आडवाणी ने जिन्ना की मजार पर जाकर उन्हें सेकुलर और हिंदू-मुस्लिम एकता का दूत बताया था जिसे लेकर काफी विवाद पैदा हो गया था । उनकी छवि कट्टर हिंदू राष्ट्रवादी नेता के रूप में थी मगर पाकिस्तान जाकर जिन्ना की तारीफ करना उनकी छवि के बिल्कुल विपरीत था।सियासी जानकारों का भी मानना है कि इस प्रकरण ने आडवाणी को सियासी रूप से काफी नुकसान पहुंचाया और वे अपने सियासी कोरियर में एक तरह से ढलान पर आ गए। भाजपा की ओर से भले ही उन्हें 2009 में प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाया गया मगर उनकी दावेदारी में वह पुराना रंग नहीं दिख सका।